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कई ट्रेनी IAS अफसर प्रेमानंद महाराज की शरण में पहुंचे; पूछा- हम शुरुवात कर रहे तो किन चीजों का ध्यान रखें, उन्होंने ये 2 बातें कहीं

Newly IAS Officers met Premanand Maharaj For Darshan

Newly IAS Officers met Premanand Maharaj For Darshan

Newly IAS Officers: वृंदावन के विश्वविख्यात संत प्रेमानंद महाराज की शरण में केवल आम लोग ही नहीं बल्कि देश में बड़े पदों पर बैठे लोग भी उनका आशीर्वाद लेने पहुंच रहे हैं। अब तक कई सारे दिग्गज नेता, सेलिब्रेटी, जस्टिस और अधिकारी उनसे मार्ग दर्शन लेने पहुंच चुके हैं। ये सिलसिला लगातार जारी है। जहां इसी कड़ी में अब 2024 बैच के कई ट्रेनी IAS अफसरों ने पोस्टिंग संभालने से पहले उनका आशीर्वाद लिया है। इन इस अफसरों में UPSC टॉपर शक्ति दुबे भी शामिल रहीं।

प्रेमानंद महाराज के दर्शन करने पहुंचे ट्रेनी IAS अफसरों ने उनसे अपनी प्रशासनिक सेवा को लेकर प्रश्न भी पूछा। जिसके बाद प्रेमानंद महाराज ने उन्हें बड़ी अच्छी और अहम सीख दी। उन्होंने ट्रेनी IAS अफसरों से कहा कि प्रशासनिक सेवा में रहते हुए उन्हें भय व प्रलोभन से बचना है। क्योंकि भय व प्रलोभन से हम कर्तव्य विमुख और अपने फर्ज से विचलित हो जाते हैं। हमें अनैतिक मार्ग नहीं अपनाना चाहिए। किसी निर्दोष को नहीं सताना चाहिए। हम यह तय करें कि हम न्याय के सिद्धांतों से समझौता नहीं करेंगे।

दरअसल, प्रेमानंद महाराज की शरण में पहुंचे ट्रेनी IAS अफसरों ने उनसे प्रश्न पूछा था कि वह सर्विस की शुरुवात करने जा रहे हैं, प्रशासनिक सेवा करते हुए किन चीजों का ध्यान रखना चाहिए? इस पर जवाब देते हुए प्रेमानंद महाराज कहते हैं, ''हम दो बातें ही निकाल पाये हैं जो हमें अपने धर्म से गिरा देती हैं। एक प्रलोभन और दूसरा भय। कर्तव्य के पालन में हम किसी के प्रलोभन में आकर के कर्तव्य रहित कार्य न करें। साथ ही किसी के भय में आकर में हमें कोई काम नहीं करना चाहिए। प्रलोभन और भय से बचकर के अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए और भगवान का स्मरण करते रहें तो आपका यही काम भगवान की भक्ति बन जाएगा''

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श्री कृष्ण और अर्जुन का उदाहरण दिया

प्रेमानंद महाराज ने भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन का उदाहरण दिया और कहा कि ''जैसे महाभारत के युद्ध में अर्जुन का कर्तव्य केवल युद्ध है। इसलिए भगवान ने खुद उन्हें गीता जी सुनाकर युद्ध में लगाया। इससे भगवान का तात्पर्य है की तुम्हें जो पद मिला है, तुम्हें जो कार्य मिला है। उसे समवयक रूप से करो। भय और प्रलोभन में कर्तव्य विरुद्ध अचारण न होने पाये। मान लो प्रलोभन में आकर हमने किसी निर्दोष को दंड दे दिया और दोषी को मुक्त कर दिया तो ये हमारा धर्म रहित कार्य हो गया। इसे कोई जाने या न जाने भगवान तो जान ही रहे हैं।''

आज लोग इस बात को नहीं समझते

प्रेमानंद महाराज ने आगे कहा कि ''लेकिन आज लोग इस बात को नहीं समझते हैं। वो समझते हैं पद का प्रयोग करके अधिक से अधिक धन कमा लो। अधिक से अधिक भोग सामाग्री जुटा लो। ऐसी बुद्धि नरक ही जाएगी। धर्म पर चलकर अगर हमें नमक ही मिले, हम साधारण भेष भूषा में ही रहें। लेकिन अगर हम धर्म से हैं और अपने राष्ट्र की सेवा कर रहे हैं। अपने भगवान की सेवा कर रहे हैं, नाम जप कर रहे हैं तो हमारी सदा उन्नति ही होगी। ये सबसे उत्तम है। क्योंकि भगवान की ही पूरी सृष्टि है।''

प्रेमानंद जी महाराज की दोनो किडनी खराब

राधारानी के परम भक्त प्रेमानंद जी महाराज के बारे में लोग ताज्जुब खाते हैं। बीते 17-18 सालों से महाराज जी की दोनो किडनी खराब हैं। लेकिन फिर भी महाराज जी के जीवंत और अद्भुत स्वरूप को देखा जा सकता है। दोनो किडनी खराब होने के बाद भी उनके चेहरे का तेज देखते ही बनता है। आज घर-घर प्रेमानंद जी महाराज को सुना जा रहा है और उनके बारे में चर्चा की जा रही है। लोग यह कहने पर मजबूर हैं कि आज के समय में अगर कोई असली संत है तो वह प्रेमानंद जी महाराज हैं।

प्रेमानंद महाराज (Premananda Maharaj) सीधी और स्पष्ट बात बोलते हैं। चाहें भले ही वह लोगों को कड़वी लगे। महाराज जी के प्रवचनों ने आज पूरे देश और दुनिया में एक नई लहर सी ला दी है। क्या युवा और क्या बड़े सब प्रेमानंद जी महाराज को सुनना चाह रहे हैं, उनके दर्शन करना चाह रहे हैं। प्रेमानंद जी महाराज के मुखमंडल से निकला एक-एक शब्द लोगों को आकर्षित कर रहा है और उनमें अच्छे बदलाव की भावना को जाग्रत कर रहा है।

प्रेमानंद महाराज का पूरा नाम क्या?

प्रेमानंद जी महाराज (Premanand Ji Maharaj) का पूरा नाम प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज है। उनका जन्म कानपुर के एक गांव में हुआ था। प्रेमानंद महाराज 13 साल की उम्र में ही रात 3 बजे घर से संन्यास के रास्ते में चलने के लिए भाग आए थे। उस समय वह कक्षा 9 में पढ़ते थे। इसके बाद वह कभी घर नहीं लौटें और अपना पूरा जीवन भगवान को समर्पित कर दिया। उन्होंने शुरुवात में संन्यास के लगभग 20 साल भगवान शिव में लीन होकर काशी में बिताए। इसके बाद वह वृंदावन आ गए और राधारानी के परम भक्त हो गए।